शुभ दीवाली (Part-I)
अष्टमी- नवमी जैसे ही आने को होती नज़ारा ही कुछ और होता .. मैं और भैया एक दम तैयार रहते कि अब तो नरसिंहगढ़ ( दादा के घर ) जाना है और खूब मस्ती करनी है। तब नरसिंहगढ़ वाला मकान कच्चा हुआ करता था .. मुझे याद हैं की बड़ी मम्मी ( ताई जी ) जब उसकी मरम्मत करने के लिए गारा ( मिट्टी + सुखी घास) बनाती थी तो लाख डांट के बावजूद हम उसमे जम जम कर कूदते और घुटने घुटने उसी में दब जाते !! जीजी (दादी को हम सभी जाने क्यूँ सदा से ही जीजी ही कहते हैं !!) एक एक कर सभी बहुओं को आवाज़ लगाती और कहती " अरी सब की सब बातां में लाग गयी, और इनग ई छोर-छोरी ऊनि गारा में कूदा- कूद मचा रीया है!" एक-आध बार जब कोई नहीं सुनता तो आखिर में जोर से कहतीं ..."अरी कनंग मर गयी सब की सब ..छोर-छोरी संभालता नी याद तो पैदा क्यों कर लीया" ...इतना सुनते एक नहीं जितनी बहुएं घर में होतीं सब दोडी चली आतीं ।। भाइयों को अक्सर एक आध चांटा पड़ता और हमें एक बाजू से जमके पकड़ कर गारे से बाहर निकाला जाता ..लगता कि पूरा हाथ उठाने वाले के हाथ में ही आ जायेगा और लगता कि अगले ही पल धम्म से गारे में जा गिरेंगे !!! वापस नहलाया जाता और कपडे बदले जाते......एक ही दिन में लगभग 4-5 बार तो नहाने और कपडे बदलने का क्रम तब तक चलता जब कि उस दिन के लिए हमारे खेलने लायक गारा नहीं बचता ! खैर ... दीवारों पर गारा लगाकर उसके सूखने का इंतज़ार किया जाता, एक बार जब वो सूख जाता तक गोबर से दीवारों की लिपाई की जाती, फिर जब वो भी सूख जाता तब एक आखिरी हाथ फेरा जाता हैं जिससे दीवारें मनो पूरी तरह समतल हो जाती ..और फिर सबसे आखिर में नेजे (चूने) से दीवारों की पुताई होती है। जैसे जैसे नेजा सूखता है सफेदी जगमगाने लगती है। एक बार जब हर दीवार का नेजा पूरी तरह सूख जाता तो बड़ी मम्मी एक भगोनी में गेरू लेकर सारी दीवारों के तलों (जमीन से लेकर एक हाथ ऊपर तक ) को रंग देती थी। इस प्रकार सप्तमी तक घर का सारा रंग रोगन हो जाता और घर तैयार हो जाता अष्टमी-नवमी की पूजा के लिए।
अष्टमी-नवमी की पूजा हर घर में अपने ही ढंग से होती है। हमारे घर में देवी जी को अष्टमी के दिन दाल-बाफले का और नवमी के दिन दाल-बाटी का भोग लगता है ! चूँकि पूजा 12 दोपहर बजे होती है और पूजा तक कुछ भी खाने की मनाही होती है तो हम सब चोके (रसोईघर ) में बार बार चक्कर लगाते और ललचाई नज़रों से खाने को निहारते ..... जब तक पूजा नहीं हो जाती पूरे समय दाल-बाफले निगाहों में घूमते रहते .... और इसी चक्कर में जब देवी जी की आरती का समय आता तो पूरे मन से उसे गाते क्योंकि वही पूजा का आखिरी पड़ाव होता है। जीजी-भाईजी ( दादी-दादा) और सभी बच्चे एक साथ खाने को बैठते थे, लालच में सभी चीज़ें थाली में डलवा लेते और धीरे धीरे जैसे ही पेट भरने लगता तो निवाला मूह में जाने की गति कम होती जाती और अंत में तो कुछ न कुछ छोड़ ही देते जो बाद में मम्मियां खातीं ! खाने के बाद कुछ देर इधर उधर करने के बाद एक एक कर सब भाईजी के इर्द-गिर्द आ-आ कर लेट जाते .. कोई उनके सिरहाने तो कोई कहाँ सब उनसे मधुमक्खी की तरह चिपक जाते ...और जैसे ही कहानी शुरू होती कि एक-एक कर सब सोने लगते जिसके सीधे शाम होते-होते लाख उठाने पर उठते। दोपहर का खाना इतना भारी हो जाता था कि रात में शायद ही कोई खाना खाता, पर बच्चों को जबरदस्ती दूध पिलाया जाता :( ! इस तरह अष्टमी-नवमी गुजर जाती ..और बारी आती दशहरे की। :) :)