Friday, March 29, 2013

"आनंद"



कह दूं ...पर क्या ? यह समझ नहीं मुझे अब आता 
अंतर्मन क्या करे, उसे भी शब्द उचित कोई सूझ नहीं पाता  !
मन का मेघ नैनो तक आकर, बिन बरसे रह जाता ..
भाव रुदन का कैसे सहज ही,  अतुलित अलख जगाता !
चित मन चंचल, शिथिल हुए अंग- अंग , चले हों 
आकुल देह और धेर्य मन, एक-दूजे के संग-संग !
अधीर हो उठी यह हृदय गति भी, समाधि  का-सा  सुख दे देती,
मनो तिमिर-पाताल गर्भ से, उठ रही अद्वितीय कोई ज्योति !
कह दूं ?... जिस पल चित-मन अपना, अपने विवेक को पाता , 
ठीक उसी पल अंतर्मन भी, शब्द कुछ ढूंढ ले आता !

"आनंद" इसी को कहते हैं जो, 
अंतरतम का दुख हर ले जाता !

Monday, March 25, 2013

आशा !




सपने कौन नहीं बुनता ?
एक दिन मैंने भी बुन लिए!
सपनो से आशा किसकी नहीं जुडती ?
एक दिन मेरी भी जुड़ गयी !
आशा निराशा में कब नहीं बदलती ?
एक दिन मेरी भी बदल गयी !
निराशा से 'निर' कब तलक जुड़ा  रहता ?
एक दिन आशा फिर दमक गयी !
आशा को सफलता कब तलक नहीं मिलती?
आखिर तो मिल ही गयी !
एक बार फिर , सपने कौन नहीं बुनता ?
मैंने भी बुन लिए और, 
आशा फिर से जुड़ गयी !


Sunday, March 24, 2013

यूँ 'हाँ' या 'न' में ज़िन्दगी नहीं चलती ..

दिन -रात के बीच सुबह शाम आते हैं,
खट्टे - मीठे के बीच स्वाद तमाम आते हैं,
यूँ 'हाँ' या 'न' में ज़िन्दगी नहीं चलती ..
चलने की राह में मंजिल से पहले ही
सेकड़ों मुकाम आते हैं !
'वीणा'
तार ढीले छोड़ दो तो स्वर नहीं निकलते,
जो कस दिए जमकर तो झट से टूट जाते हैं,
आर-पार के बीच हजारों वार आते हैं ..
यूँ 'हाँ' या 'न' में ज़िन्दगी नहीं चलती ..
ज़िन्दगी और मौत के बीच भी
'जीने' और 'मरने' के मौके तमाम आते हैं !


Thursday, March 7, 2013

Maa


कुछ चेहरें /चीज़ें आपके जीवन से इस तरह जुडी हुई होती हैं जैसे स्वयं जीवन! चारों  पहर आपके साथ है  पर उसके होने का एक अंश मात्र  भी एहसास  आपको नहीं होता, वो आपमें व्याप्त हैं या आप उसमे ये प्रश्न सदा अनुत्तरित ही रह जाता है।

11 साल की नन्ही उम्र में मुझे अपने से दूर करने की हिम्मत पापा नहीं कर पाए थे, पर मजाल तुम अपने निर्णय से रत्ती भर भी डिगी। पहले-पहल  मन सकुचाया पर जब निर्णय लिया तो अंत तक तुम्ही थी जिसने निभाया .. भाई भी जब पहली दफे मिलने आया तो जाते समय अन्दर के झरने को रोक न पाया ..  बोला, तेरे बिना घर में बिल्कुल अच्छा नहीं लगता, तू वापस चल ..मैं पापा से बात करता हूँ ! तुम न कभी रोई न मुझे हद से ज्यादा रोने दिया .. जब-जब मैंने हद पार की तुम कठोर होती चली गई। बाल मन था न तो लगता कि शायद ये माँ सगी नहीं है। पर ये बात भी ज्यादा समय मन में ठहरती नहीं थी  .. सप्ताह के पहले रविवार  का बेसब्री से इंतज़ार होता तुम्हारे आने का और उससे भी ज्यादा तुम्हारे हाथों के बने खाने का! जिस तरह तस्सल्ली से बैठा कर तुम मुझे खाना खिलाती, उसके बाद मेरे सर से सेकड़ों की तादात में जुएँ निकालती  और तेल लगाकर दो लम्बी-लम्बी नागिन जैसी चोटियाँ गुथती ( जिन्हें में आने वाले तीन दिन तक ज्यों का त्यों संजोये रखती), मुझे पूरा यकीं हो जाता कि तुम ही मेरी सगी माँ हो! 

स्कूली पढाई तो चलो मैंने  90 किलो मीटर की दूरी पर ही पूरी कर ली थी, पर अब मैं मीलों दूर जाने को तैयार थी .. मुझे लगा बस अब तुम सह न पाओगी ... पर ये क्या तुम टस से मस नहीं हुई .. एक आंसूं भी तुम्हारी आँखों  से नहीं टपका जब पहली दफे मुझे  इस महानगर में पढने को छोड़ गए। मुझे पता है कि पापा मुझसे नज़रें नहीं मिला रहे थे, उन आँखों  में  समुन्दर जो उमड़ रहा था ..पर तुम!.. तुम्हारे चेहरे पर दूरी का दंश मात्र भी नहीं था! इस रूप को मैं समझ ही नहीं पा रही थी ...... जाते वक्त बस यही कहा "अच्छे से पढना !" 
   
आज चकित हूँ कि कहाँ से लायीं तुम इतना धैर्य ! अपने आंसुओं पर इतना नियंत्रण ! यह नियंत्रण नहीं, तुम्हारा चरित्र है .. संवेदनाओं  के परे जाकर ...

"एक नारी द्वारा  दूसरी नारी को सशक्त एवं आत्म-निर्भर बनाने वाला चरित्र"
  
माँ! तुम्हारा मेरे जीवन में होना मेरा जीवन है ..