Monday, December 10, 2012

Navodaya, Paani, Ped aur Premi !!

राजगढ़ जिला मध्य प्रदेश के सूखा प्रभावित जिलों में से एक है। मार्च का महीना आते आते सभी कुओं में पानी लगभग समाप्त होने लगता है .... आज भी घरों में पीने के पानी की पूर्ति के लिए गाँव की स्त्रियाँ, घर के काम को निपटाकर, भरी दोपहरी में चार-चार गगरे  लिए निकल पड़ती  हैं  उन एक आध सरकारी हैण्ड-पंपों की ओर  जहाँ कभी कभी तो  बारी आते आते शाम ढल जाती है। दो गगरे सर पर ( एक के ऊपर एक ) और बचे दो दोनों हाथों में एक-एक लिए वे चार या छह के समूहों में घर लौटती हैं, नहाने-धोने का पानी पास के पोखर से  ले लिया जाता हैं और वैसे भी नहाना तो  पोखर की मेड पर ही हो जाता  है और सुबह की शोच के लिए आज भी गाँव में अधिकांश लोग जंगलों में जाते हैं ...! जूठे बर्तनों को पहले सूखी राख से अच्छे से रगड़कर  और फिर एक कपडे से साफ़ कर लिया जाता है . इस काम में पानी का लगभग न के बराबर इस्तेमाल होता है। कपड़ों को पोखर पर या पास की किसी नदी पर या खेतों में बने बड़े कुओं पर धो  लिया जाता है। 

गाँव के कुछ थोड़े ज्यादा संपन्न कस्बों में पानी की हर जरूरत की पूर्ति मोल  के  पानी से होती है। जिन लोगों के खेतों के कुओं में पानी पर्याप्त मात्र में होता है वो टंकेरों  में भरकर कस्बे में बेचते हैं। एक लीटर पानी लग-भग एक रूपये का मिलता है। पर ये भी इतना आसन नहीं होता ..टेंकर के इंतजार में घर के हर बर्तन को कई बार रात-रात भर इंतज़ार करना पड़ता है। कभी टैंकर का पानी पीने लायक नहीं होता ..और कभी अन्दर गलियों में टैंकर पहुँच ही नहीं पाता है! खैर ..... कक्षा 6 में मैंने जिले के जवाहर नवोदय विद्यालय में प्रवेश लिया। मेरा स्कूल घर से लगभग 90-95 किलोमीटर दूर और जिले के उस छोर पर है जहाँ पानी की समस्या मेरे कस्बे से भी ज्यादा गंभीर थी। स्कूल में प्रवेश 1997 के जुलाई महीने में  हुआ था और हमारे प्रवेश के समय ही एक नयी व्यायाम शिक्षिका स्कूल में तबादले पर आई थी; इन्द्राणी बिट ! कुछ गरम मिजाज़ जरूर थी पर प्यार भी भरपूर करती थी .. अनुशासन के मामले में किसी भी तरह की लापरवाही उन्हें रास नहीं आती थी । बिट मैडम के आने के बाद अगले महीने स्कूल में एक नए प्राचार्य की नियुक्ति हुई; के पी सिंह ! शुरूआती एक महीने में ही उन दोनों के आने से स्कूल की कार्यप्रणाली में सकारात्मक परिणाम आने प्रारंभ हो गए थे।पर आज जब में देखती हूँ तो सबसे खास जो मुझे लगता है वो था बंजर धरती को चमन बनाने का उनका प्रयास। विद्यार्थियों और कुछ अभिभावकों की मदद से पूरे स्कूल परिसर में पौधे रोप गए ..अभी तक पानी के टैंकर सिर्फ रोज़मर्रा की जरूरतों के लिए आते थे अब अतिरिक्त टैंकर आने लगे क्योंकि पोधों में पानी देना प्राथमिकता बन गयी थी। रोज़ शाम को जब खेल-कूद के लिए हम मैदान पर जाते तो आखिर के 15 मिनट सभी बच्चे अपनी-अपनी बाल्टियों में पानी भरकर पोधों को तर-बतर कर देते। अनुशासन तोड़ने पर पोधों में पानी डालने का दंड मिलने लगा ... दौड़ कर हॉस्टल जाते बाल्टी उठाकर लाते और कम  गहरी सीमेंट की टंकियों  में से हाथों से ही उलीच कर बाल्टी भरते और फिर जाते अपने-अपने पौधों की तरफ ....हमारी उम्र छोटी थी तो बाल्टी भी छोटी और फिर दो दोस्त मिलकर एक बाल्टी उठाते थे। 


पहले पहल मज़ा आने लगा पर जब रोज़ रोज़ ये क्रम आगे बड़ा तो हम लोगों ने काम चोरी भी शुरू की! बाल्टी आधी ही भरने लगे और जब कभी बाल्टी बिट मैडम की नज़रों  में आ जाती तो  कह देते मैडम " पानी झलक गया ..क्योंकि बैलेंस नहीं बन पा रहा है ! " ... खैर मैडम तो हमारी मैडम ही थी उन्होंने "बाल्टी-पार्टनर्स" बना दिए जिनकी लम्बाई बराबर  की हो  :) ... अब बैलेंस का बहाना हाथ से चला गया ... और ऐसे में नए  दोस्त भी बने ..एक बार फिर मज़ा आने लगा ... !! सप्ताह में इसी तरह खाद भी डाली जाती, और जब एक बार पेड़ों ने जडें  पकड़  ली तो पानी डालने के दिन भी कम होते चले गए ...ये क्रम कक्षा 8 तक चलता रहा। कक्षा 9 में मैं गुजरात चली गयी और जब कक्षा 10 के लिए वापस आयी तो ये क्रम टूट चूका था ..पर तब तक पेड़ों में स्वयं को जिंदा रखने की ताकत आ चुकी थी शायद ......अधिकतर पेड़ मेरे कद तक तो आ ही चुके थे पर फिर भी विश्वास नहीं हुआ .... जब ... पूरे 12 सालों बाद एक मित्र में स्कूल की ताज़ी तस्वीर फेसबुक पर लगाई .. 





विश्वास नहीं हुआ कि ये वही  पेड़ हैं जिन्हें कभी मन तो कभी बे-मन सींचा था हमने ..विश्वास नहीं हुआ कि हमारी मेहनत यूँ रंग दिखाएगी ..विश्वास नहीं हुआ कि वो बंजर ज़मीन आज "भूमि" बन बैठी हैं ..उसकी छाती पर सेकड़ों पेड़ लहलहा रहें हैं ..विश्वास नहीं हुआ कि यूँही बिना कुछ सोचे मैडम की डांट के डर से बाल्टियों का पानी और खाद  पेड़ों पर उधेल देने का परिणाम जब कभी देखूँगी तो खुद को इतराने से रोक नहीं पाऊँगी ... !!! 



ये अलग बात है कि अब प्रेमी बड़े दुखी रहते होंगे  .. वे दूर से ही एक दूसरे के हॉस्टल की ख़ास खिडकियों पर जो नज़र रखते थे ..अब ये पेड़ बाधा बन खड़े हैं !! पर "जहाँ चाह वहां राह " ...यश चोपड़ा साहब कुछ और न सही  पेड़ों के पीछे रोमांस करना तो सीखा ही गए .. और कचनारिया की उस बंजर ज़मीन पर भी पेड़ों की अब कोई कमी नहीं !!! :D :D :D





6 comments:

  1. I just love it............. Amazing Richa Gud work Keep it Up...........

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    1. I hope you will get to read more of such stuff in times to come :)

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  3. I hv only words...That...SM1 alrdy said ie No WORDS!!! Supurb $$thumsup$$

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