Tuesday, July 9, 2013

Boond !


दिन-रात यूँ बरसी में पल पल ..
खिड़की से बाहर जो हाथ बढाया होता..
मीलों का सफ़र तय किया था मैंने 
एक कदम भी धरती का जो नापा होता ...
उचाईयों से हर बार उतरी और बेजार हुई 
अंजुलियों में एक बार तो उठाया होता ...
इंतज़ार में तेरे बादल को मनाया हर बार 
बाहें फैलाकर भीगते हुए गाना एक गुनगुनाया होता ..
मिट्टी ने मर्म भाव से अपनाया मुझे
एक बीज जो तुमने पहले से डाला होता ...
बूँद मैं बादल से झगड़ कर आयी ...
बंधन दीवारों का तोड़कर
खुले मैदानों में
उन्मुक्त उड़ने का साहस तुमने दिखाया जो होता ...
बूँद में बरसात बनी, बनती में अंकुर
साथ मिलकर तुमने और मैंने सृजन नया संवारा होता !!

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