"इंद्र की नगरी"
अपना नाम बिना किसी
उपनाम के लिखने वाली वह मुझे पहली शख्स मिली थी I लैय्या/ झाल-मुड़ी/
दही-चुडा के स्वाद का रस उसकी चमकती आँखों से झरता था .. अक्सर "साथिया"
या "रहना है तेरे दिल में" के गानों को आँखें मूँद के गुनगनाती थी !
पूछो तो कहती थी " स्कूल बस में आते- जाते वो इन्हीं गानो को गुनगुनाकर मुझे
चिढाता था !" स्कूल पीछे छोड़कर हम दिल्ली आ गए थे .. नयी जगह, नए माहोल और पुराने
किस्सों ने हमें करीबी दोस्त बना दिया था I अरे कॉलेज का
स्वेट-शर्ट खरीदो न, छुट्टियों
में ट्रेन
में उसको पहनकर घर जाने का अपना टशन है .. ये कहते हुए दोनों हाथों की गुत्थी
बनाते हुए मेरे कमरे के दरवाज़े से सटकर खड़ी हो जाती और आँखों से बतियाती I कद-काठी ऐसी कि एक रोज़
कॉलेज के मैन गेट के बाहर, एस्क्युस
मी मेम कहकर, किसी
एड एजेंसी ने मॉडलिंग का ऑफर दे दिया ! सड़क पार के यूनिवर्सिटी हॉस्टल के कैंटीन
मे दिन में एक बार समोसा खाने जरूर जाती.. ब्रेड-आमलेट का उससे ज्यादा शौक़ीन तो
मुझे तब तक कोई और नहीं मिला था, डबल
अंडे का आमलेट बनवाते-बनवाते बातों से दीपक भैया के मजे लेती ! जितना दही उसमे
उतनी ही चीनी मिलाकर खाती और 'बनाना' ( केला) उसका फेवरेट
फ्रूट था, इतना
कि एकबार जब एक्स्टेम्पोर में उसे 'बनाना' पर ही बोलने को मिल गया
तो पूरे 3 मिनट
तक बोलती रही ! मैंने पहली बार मोमोस उसी के साथ खाए थे कमला नगर के "मोमोस
पॉइंट" पे, पर
पसंद हमें ज्यादा "नूडल्स" का खाना आता था ! पहली बार जब मोबाइल ख़राब
हुआ तो खोजते- खोजते घंटाघर में नोकिया सर्विस सेंटर पहुंचे.. वहां ठीक उसी मॉडल
का फ़ोन ठीक करने आई SRCC
की लड़की से उसने पलभर में जान-पहचान कर ली और उसे फ़ोन के
सम्बन्ध में ज्यादा टेंशन न लेनी की सलाह भी दे दी !
पाकिस्तानी
बैंड्स की दीवानी थी.. दूर से कोई आये, कहीं
चुपके से वो दिल में समां जाये $$ साजना
$$.. इअर फ़ोन्स पर सुनते-सुनते जब कभी ज़ोर
ज़ोर से गाने लगती तो मुझे हंसी आ जाती थी । जल बैंड जब हिन्दू कॉलेज में आया तो
गला फाड़-फाड़ हर एक गाना गाया .. मुझे याद है उससे हुई बहस के बाद मैं कैसे पहली
बार बिना दुपट्टा ओढ़े उस लाइव शो के लिए गए थी! तर्क दिया कि कैसे जब
झूमने/उछलने/नाचने की बारी आती है तो मैं आधे वक़्त अपना दुपट्टा ही संभालते रह
जाती हूँ ! आतिफ असलम को किसी लड़की से बेहद प्यार था, वो दुनिया में नहीं रही तो उस दर्द में उसने गाना
और गाने लिखना सीखा, ऐसा उसने मुझे बताया और गूगल से सबूत
इकट्ठे कर अपनी बात को मनवाया ! गौहर और आतिफ के मनमुटाव के चलते जल बैंड के बिखर
जाने पर बहुत उदास हुई थी.. इसी बात को लेकर हमने मंथन किया था कि कैसे सलीम-जावेद, जतिन-ललित इत्यादि जोड़ियों के बिखरने के बाद वो
बात नहीं रही । ऑरकुट पर मेरे लिए पहला टेस्टीमोनियल उसी ने लिखा था और उसके लिए
मैंने I जेरोक्स से ज्यादा ऑरकुट के चक्कर में पटेल चेस्ट जाते थे, आलम ये था कि वहां के साइबर कैफ़े में जगह न होने
पर रिक्शा लेके हडसन लाइन तो कभी विजयनगर तक भी जाया करते थे। हॉस्टल का साइबर
कैफ़े जो रेनोवेशन के चलते बंद था उसको री-ओपन करवाने की सबसे बढ़ी वजह हमारे लिए
ऑरकुट ही था ;) ! याहू
चैट रूम में बतियाते वक़्त किसी को अपना ओरिजिनल ईमेल ID न देने की सलाह भी मुझे उसी से ही मिली थी। उसके
पास कोई 2-3 ईमेल ID थी, खास लोगों के एक ID,
बस जान-पहचान वालों के लिए दूसरी और अजनबियों के लिए तीसरी, कुछ इस टाइप से उनका क्लासिफिकेशन किया हुआ था ! कोई
लड़का उसे परेशान करे और वो जाने दे ऐसा असंभव था । वल्ला कि एक संस्थान विशेष
(जहाँ लड़कों का बाहुल देखने को मिलता है) ने जब एक कम्पटीशन में हमारे साथ
नाइंसाफी करते हुए हमें पहला स्थान नहीं दिया तो उसने योजना बनायीं ! उस
प्रतियोगिता विशेष के आयोजकों का नाम एवं मोबाइल नंबर वो पोस्टर से उतार अपने
मोबाइल में सेव कर लायी। नई सिम खरीदने में आजकल वाली मशक्कत नहीं लगती थी, जिस दिन खरीदो नंबर चालू ! तो नयी सिम ली गयी और
स्थान A ब्लाक वाला एक कमरा और समय रात्रि 12 के बाद का तय कर लिया गया। लैपटॉप का चलन न के
बराबर था, गानों के लिए लोग FM वाला मोबाइल खरीदते और जिनके पास ज्यादा पॉकेट
खर्च रहता वो CD प्लेयर्स रखा करते थे। उसके पास दोनों
ही थे । तो ! आयोजकों में जिस महानुभव का नाम सबसे ऊपर था उनका नंबर मिलाया गया और
जैसे ही उधर से उन्होंने सायानी सी आवाज़ में हेल्लो बोला इधर खट से हमने बटन दबा के
गाना बजाया ".....झलक दिख ला जा...एक बार आजा आजा आ$$$ जा ..." । जब वो बीच में जोर-जोर से हेल्लो
चिल्लाते तो फ़ोन काट दिया जाता और पूरी प्रक्रिया दोहराई जाती । और अंत में तारीख
और अख़बार के नाम सहित ये sms कर दिया जाता कि कैसे राजस्थान के किसी
गाँव में एक बारात में इस गाने के बजने पर नाचने वाले पर भूत आ गया था ! आप हैं
कौन/यार नाम तो बता दो/यार प्लीज ../ इत्यादि प्रकार के टेक्स्ट मेसेज आते । किसी
का भी कोई जवाब नहीं दिया जाता ! एक-एक कर सभी आयोजकों का नंबर आया और कुल 5 दिन तक ये सिलसिला चला जब एक ने लिखकर भेजा ...
"आप जो भी हैं, हमसे अनजाने में कोई भूल हो गयी हो तो
माफ़ कर दें।" दिल उन दिनों बिलकुल ब्री चीस हुआ करता था ज़रा में पिघल गया। उन
दिनों की सोचूं तो लगता है वही दिल अब पार्मेसन बन पड़ा है ;) खैर।
सरप्राइज
देने में उसे बड़ा मज़ा आता था I किसी काम से बिना बताये कमला नगर गयी हो, घर जाने
की ट्रेन उस वक़्त हो जब में कॉलेज में रहूँ, मैं नहाने गयी हो और उसे पूरे दिन को
कॉलेज में ही रहना हो तो लड़की की फ्रेम में जड़े आईने के ऊपर एक स्टिकी नोट चिपका
जाती .. किसी में लिखा होता .. “कमला नगर जा रही हूँ, कुछ लाना हो तो sms कर देना,
जल्दी में थी मिल नहीं पायी !” किसी में .. “इट्स अ मेट्टर ऑफ़ जस्ट वन मंथ.. सी यू
आफ्टर वेकेशन ..विल मिस यू लोटस !” ऐसे अनगिनत स्टिकी नोट्स मैंने अपनी यादों के
खजाने में संभाल के रख रखे हैं.. सबको मिलाकर कभी लिख दूं तो किसी दिल-अज़ीज़ प्रेमी
के पत्रों से कम नहीं जान पड़ेंगे! मैं उससे ये छोटी-छोटी प्यारी बातें सीख रही थी
..पर थोड़ी कच्ची ही रही! हाँ, एक बार जरूर कुछ नया कर पाई ..दिवाली की छुट्टियाँ
लगने को थी, सबने घर की राह पकड़ ली थीI मेरी ट्रेन उसके एक दिन बाद थीI दोपहर कोई
1-२ बजे के करीब उसे स्टेशन पहुँचना था, मेट्रो उन्ही दिनों चली थी पर सामान की
सीमा के चलते ऑटो से ही जाना पड़ा I दोनों भीन्झ के गले लगे और ऑटो चल पड़ा I रूम
में आई, तो देखा एक और स्टिकी नोट चिपका हुआ है .. “ब्रिंग गूडीस फॉर मी ..विल कॉल
यू फ्रॉम होम ..टेक केयर !! लव यू लोड्स ...!! पता नहीं क्या सूझी, मैं एक और
सहेली को साथ ले मेट्रो से नई दिल्ली को निकल पड़ीI वैसे भी बाते इतनी detailing से
करते थे कि ट्रेन का नंबर तक पता था, तो बोगी और टाइम का तो छोड़ ही दो !
प्लेटफोर्म पर तेज़ गति से उसकी बोगी की तरफ बड़े जा रहे थे ..ट्रेन छूटने में १०-१५
बचे थे.. और खिड़की से आवाज़ मारी ...... वो सामान को सीट के नीचे एडजस्ट करने में
लगी थी ! जैसे ही हमे देखा दोनों हाथ कमर पर रख पीछे को झुकते हुए, आँखों को बल्ब
सा चमकाते हुए .. उसने वही W..T..F.. वाले एक्सप्रेशन दिए ! फिर, तुरंत नीचे उतर
आई और .. एक्सप्रेशन देती रही ..कभी aww..वाला मूह बनाती और एक हाथ से होठों को
छिपाती, कभी गले लगती, हँसे जा रही थी ..और हम भी ..!! कुल मिलके प्लान सफल रहा
..वो बेहद खुश हुई ! मैं उससे भी ज्यादा, क्योंकि मुझे हमेशा सरप्राइज करने वाले
को आज मैंने धमाकेदार सरप्राइज दे दिया था ! थोड़ी देर में अनाउंसमेंट हुआ कि
तकनीकी खराबी के चलते ट्रेन २० मिनट की देरी से जाएगी ! हम तीनो होहो...$$$ करके
चिल्ला उठे ! कोल्डड्रिंक पीते पीते गप्पे हांकने लगे की अचानक ट्रेन सरकती दिखाई
दी ..दोड़कर उसे चढ़ाया और ट्रेन के बहुत तेज़ होने तक साथ साथ चलते रहे ...!
पर
ज़िन्दगी की ट्रेन में उसकी बोगी के साथ-साथ नहीं चल पाई ! कॉलेज के आखिरी साल
हॉस्टल पॉलिटिक्स और अपनी नादानियों के चलते भयंकर मैन-मुटाव हुआ I दिल मख़मली ब्री
से सख्त पार्मेसन होने लगा .. बोल-चाल एकदम बंद हो गया ! रूम अगल बगल थे तो टकराना
तो स्वाभाविक था, पर नज़रें चुरा लेते ! हॉस्टल में भी सुगबुगाहट थी कि आखिर मामला
क्या है, पर कुछ कंक्रीट हो तो कुछ समझ आये I परिस्थिति का सामान्यीकरण हो गया, सब
का कौतुहल जाता रहा और सुगबुगाहट शांत हो गयी I पर हमारी नज़रें जब भी मिली हमने एक
टेस महसूस की ! ... और आखिर एक रात मेरा डोर किसी ने नॉक किया ! सामने वही थी !
अनायास दिल की ख़ुशी होंठों पे मुस्कान बनके पसर आई .. वो भी मुस्कुरा दी ! वो मुझे
बताने आई थी कि “कल वो मुझसे मिलने आने वाला है, चूँकि सिर्फ एक तुम ही हो जो शुरू
से आखिर सब जानती हो मैं तुमसे ये बात शेयर करना चाहती हूँ ..!” आई फेल्ट वैरी स्पेशल
इन डेट मोमेंट, मुझे लगा खोयी गर्माहट फिर लोट आई है ! मैंने रूम में अन्दर आने को
कहा ... और धीमे-धीमे बातें होने लगी...हम बीच-बीच में अनायास मुस्कुराते रहे थे .. शायद दोनों ही
यह जान रहे थे कि कबसे ऐसे बातें करने को जी चाह रहा था ! पर, उस उम्र के अक्खडपन
और अपरिपक्वता के चलते उस रात के अनुभव को जिंदा नहीं रख पाए .. दोनों के कान
कच्चे थे ! ईगो क्लेशस् आये, मनमुटाव
बड़ा और बातें बंद हो गयी ... उसने हॉस्टल के आखिर दिनों में आइस ब्रेक करने के लिए
अपने रूम में टी-पार्टी रखी और मैंने न्योता स्वीकार कर लिया ! फिलिप्स के छोटे
स्टेरियो पर साथिया के गाने मद्धम आवाज़ में बज़ रहे थे और बिजली वाले हीटर (जिसे
कमरे में रखना गैर-कानूनी था) पर चाय बन रही थी I मिल-बैठ के भोर होने तक बातें की
..पर एक अन-कही ख़ामोशी पसरी हुई थी, शायद इसीलिए कि सब जुबां से बातें कर रहे थे,
दिल से कोई नहीं I सभी का बचपना ईगो बनके झांख रहा था जो उस समय बचपना नहीं
आत्मसम्मान जान पड़ रहा था !
कॉलेज के बाद DU
के एक्सटेंडेड नार्थ कैंपस में वो यदा-कदा एक साल तक दिखयी पड़ी, फिर गुम हो गयी !
न फ़ोन, न ऑरकुट, न फेसबुक और हर ईमेल address पर donotereply वाला failed notice आता ! लाइफ आगे
बढ़ गयी .. बीच-बीच में ख्याल आता रहता “ क्यूँ सिर्फ लड़का-लड़की के बिछुड़ने वाले
ब्रेक-अप को इतना discuss किया जाता है ? दो अच्छे दोस्तों (चाहे लड़की-लड़की हो या
लड़का-लड़का, या लड़का-लड़की) का ब्रेक-अप उस ब्रेक-अप से कम पीड़ादायी नहीं होता ! बीच-बीच
में एक टीस सी उठती रहती है ..काश ! काश ये कहा होता, ये न कहा होता, वो किया
होता, वो न किया होता ! एक टीस जिसके साथ आप धीरे-धीरे जीना सीख लेते हो जैसे किसी
अन्य ब्रेक-अप के बाद ! और जब कभी दबी हुई टीस अचानक गुफा को भेदती हुई स्मृति में
कौंध जाती है तो पलटने लगते हो करवटें और हटाते हो यादों से धूल ... !
कल एक
get-together में उसका जिक्र आया तो मैंने रूम पर वापस आकर, cupborad में ऊपर ही
ऊपर रखे कार्टन से एक लिफाफा निकाला ! ढेरों स्टिकी नोट्स में से जो हाथ लगा उसमे
लिखा था .. “I have
finished Five Point Someone, keeping it for you! After reading this you
would know that I am not illogical when I say you can write!” Five Point Someone
पहली रात उसने निपटाया था और दूसरी रात मैंने! और वाकई Anything For You Ma’am
पढ़कर तो हमें पूरा यकीन हो ही गया था कि हम भी लिख सकते हैं ! उसके पास गानों के
केसेट्स थे और कुछ किताबें.. सब पर लिखा होता था "दिस बीलोंग्स टू .. (उसका
नाम)" !! उसने अपने नाम का अर्थ बताया था "इंद्र की नगरी" !
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