कह दूं ...पर क्या ? यह समझ नहीं मुझे अब आता
अंतर्मन क्या करे, उसे भी शब्द उचित कोई सूझ नहीं पाता !
मन का मेघ नैनो तक आकर, बिन बरसे रह जाता ..
भाव रुदन का कैसे सहज ही, अतुलित अलख जगाता !
चित मन चंचल, शिथिल हुए अंग- अंग , चले हों
आकुल देह और धेर्य मन, एक-दूजे के संग-संग !
अधीर हो उठी यह हृदय गति भी, समाधि का-सा सुख दे देती,
मनो तिमिर-पाताल गर्भ से, उठ रही अद्वितीय कोई ज्योति !
कह दूं ?... जिस पल चित-मन अपना, अपने विवेक को पाता ,
ठीक उसी पल अंतर्मन भी, शब्द कुछ ढूंढ ले आता !
"आनंद" इसी को कहते हैं जो,
अंतरतम का दुख हर ले जाता !
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