Sunday, March 24, 2013

यूँ 'हाँ' या 'न' में ज़िन्दगी नहीं चलती ..

दिन -रात के बीच सुबह शाम आते हैं,
खट्टे - मीठे के बीच स्वाद तमाम आते हैं,
यूँ 'हाँ' या 'न' में ज़िन्दगी नहीं चलती ..
चलने की राह में मंजिल से पहले ही
सेकड़ों मुकाम आते हैं !
'वीणा'
तार ढीले छोड़ दो तो स्वर नहीं निकलते,
जो कस दिए जमकर तो झट से टूट जाते हैं,
आर-पार के बीच हजारों वार आते हैं ..
यूँ 'हाँ' या 'न' में ज़िन्दगी नहीं चलती ..
ज़िन्दगी और मौत के बीच भी
'जीने' और 'मरने' के मौके तमाम आते हैं !


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